भारत का इतिहास काफी समृद्ध रहा है। इस महान राष्ट्र के हर कोने से कोई न कोई अनोखी इबारत लिखी गई है। आप देश के किसी भी कोने में जाएं हर हिस्सा अपनी कहानी ख़ुद बयां करता है। हमारा देश भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक सभी रूपों में अपनी सम्पन्नता लिए हुए है।

ख़ास कर हमारा इतिहास काफी रूचिकर रहा है। विदेशों से आये वंशों से लेकर स्थानीय शासकों ने इतिहास को हर समय में जीवंत बनाए रखा। इतिहास के वे तमाम शासक आज भी याद किये जाते हैं, जिनकी कृतियों ने अपना वजूद वर्तमान समय में भी बनाए रखा है। ऐसी ही एक दिलचस्प कृति है कर्नाटक के सकलेशपुर में स्थित “मंजराबाद का किला”।

1. टीपू ने बनाया था मंजराबाद का किला

  • मंजराबाद का इस्लामिक शैली से बना शानदार किला मैसूर के तत्कालीन शासक टीपू सुल्तान ने बनाया था। इस किले का निर्माण साल 1785 में शुरू हुआ था और यह बन कर 1792 में तैयार हो गया था। तब से लेकर आज तक यह अपनी विरासत को संभालते हुए खड़ा है।
  • यह किला पश्चिमी घाट के हिस्से में समाई एक छोटी पहाड़ी पर बनाया गया है। इसकी ख़ास बात यह है कि यह किला एक ही निर्माण स्थल पर बना हुआ है।

2. मंजराबाद किले के निर्माण के पीछे की कहानी

  • 18वीं सदी के अंत में अंग्रेज भारत पर अपना साम्राज्य स्थापित करने की जंग में आगे बढ़ते जा रहे थे। दक्षिण भारत में उनके इस मंसूबे के बीच सबसे बड़ा रोड़ा था टीपू सुल्तान। उस समय मराठों और हैदराबाद के निज़ाम ने भी अंग्रेजों से हाथ मिला लिया था। ऐसे में टीपू अकेला पड़ चुका था।
  • साल 1792 में अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए इस किले का निर्माण टीपू ने रक्षा कवच के रूप में करवाया था।
  • टीपू सुल्तान अपने साम्राज्य को बनाये रखने के लिए मंगलौर और कुर्ग के बीच एक हाइवे बनाना चाहते थे। इसी मार्ग पर इस किले के निर्माण का प्रस्ताव रखा गया। उस समय अंग्रेजों से लड़ने के लिए टीपू फ्रांसीसियों के साथ हाथ मिला चुके थे। उन्होंने एक विशेष तरह का किला बनवाने के लिए फ्रेंच इंजीनियर से भी मदद मांगी।
  • इसके बाद प्रसिद्ध फ्रांसीसी वास्तुकार वौबन ने इस कार्य में मदद करी। जिससे किले का निर्माण सम्भव हुआ।

3. सुरक्षा की दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण था मंजराबाद किला

  • सबसे ख़ास बात यह थी कि यह उन सभी रास्तों को रोकता था जो आसपास के तटीय क्षेत्रों से सकलेशपुर के पीछे स्थित पठार तक पहुंचने के काम आ सकते थे।
  • टीपू यहां अपनी सेना का असला बारूद रखा करते थे। साथ ही ऊंचाई पर होने के कारण मंगलोर से आने वाले दुश्मनों पर नज़र रखने के लिए भी यह किला उपयुक्त था।

4. कैसे पड़ा किले का नाम ‘मंजराबाद’

इस किले के ‘मंजराबाद’ नामकरण की कहानी भी काफी दिलचस्प है।

  • जब 1792 में यह किला बन कर तैयार हुआ तो सुल्तान टीपू इसको देखने के लिए आए।
  • उस समय कोहरे की वजह से किला उन्हें दिखाई नहीं दिया। किला कोहरे की चादर में छिप गया था। इसी वजह से इसका नाम ‘मंजराबाद’ रखा गया।
  • मंजराबाद में ‘मजरा’ शब्द ‘मंजू’ से लिया गया है और स्थानीय भाषा में इसका मतलब ‘कोहरा’ होता है।

5. किले में बनी है गुप्त सुरंग

  • इस किले में एक सुरंग भी बनी हुई है। यह सामरिक दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण हुआ करती थी। यहां से इस सुरंग द्वारा श्रीरंगपटना तक जाया जा सकता था।
  • सुरंग के निर्माण के कुछ समय बाद इस सुरंग का इस्तेमाल शव दफनाने के लिए किया जाने लगा था।
Manjarabad-Fort

6. स्टार (तारे) के आकार में बने इस किले में बहुत कुछ है ख़ास

  • राष्ट्रीय राजमार्ग 48 पर बने मंजराबाद के इस किले का आसमान से देखने पर तारेनुमा आकृति दिखाई देती है। इस वजह से इसे “एक सितारा” किला भी कहा जाता है।
  • यह किला समुद्र तल से 3240 मीटर ऊंचाई पर बना हुआ है।
  • इस्लामिक शैली से बने इस किले का प्रवेश द्वार ख़ास धनुषाकार आकृति में बनाया गया है।
  • इस किले में बहुत सारे कमरें बने हुए हैं। कुछ कमरों में घोड़ो को रखा जाता था। कुछ में सैनिकों की रसोई, बाथरूम भी हुआ करते थे। यहां पानी का स्रोत किले के बीच बने क्रॉस आकार के गड्डे हुआ करते थे। यह किला सैनिकों के रहने के लिए काफी उपयुक्त हुआ करता था।

7. पश्चिमी घाट के सौंदर्य के बीच जैसे तारे की तरह चमकता है मंजराबाद

  • पश्चिमी घाट विश्व के सबसे सम्पन्न जैव विविधता वाले क्षेत्रों में गिना जाता है। यह दुनिया के सबसे सुंदर तटीय इलाकों में गिना जाता है। यहां पेड़-पौधों और जीवों की लाखों प्रजातियां पाई जाती है। पहाड़ और जंगलों से घिरे इस इलाके में धरती का एक स्वर्ग बना दिखाई देता है।
  • ऐसे प्राकृतिक सौंदर्य से भरे वातावरण के बीच ‘मंजराबाद का किला’ आसमान से तारे की तरह चमकता दिखाई देता है। ऐसा लगता है हरे आसमान में कोई तारा टँगा हुआ हो।
  • पूरे भारतवर्ष में तारे की तरह बना यह अपनी तरह का एकमात्र किला है। यहां प्रकृति और इंसानी वास्तुकला का बेजोड़ नमूना देखने को मिलता है।

8. कैसे जाएं मंजराबाद

मंजराबाद सकलेशपुर कस्बे से मात्र 6 मील दूर है। यहां जाने के लिए सकलेशपुर पहुंचना होता है। जहां से सड़क मार्ग से मंजराबाद पहुंचा जा सकता है।

सकलेशपुर मंगलोर हवाई अड्डे के पास है। यहां से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ाने उपलब्ध हैं।
सकलेशपुर रेलवे मार्ग से मंगलोर, बेंगलुरु और अन्य बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है।

सकलेशपुर बस सेवा से सभी क्षेत्रीय जगहों से जुड़ा हुआ है। यहां सरकारी और प्राइवेट दोनों बस सेवाएं उपलब्ध हो जाती है।

सितारे के आकार में बने अपनी तरह के इस किले की ग्रेनाइट से बनी दीवारें इतिहास की कहानियों को अपने अंदर आज भी जिंदा रखे हुए हैं।

वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना पेश करते इस किले के कमरें आज भी ठंडक से भरे रहते हैं।
सितारे के आकार के बने अपनी तरह के इस अजूबे को देख कर एकबारगी तो यकीन नहीं होता कि हमारे पूर्वजों ने कैसे इस तरह की इमारतों के निर्माण को अंजाम दिया होगा।

आमतौर पर यह धारणा रहती है कि उत्तर भारत में उत्कृष्ट शैली के किले इतिहास में निर्मित किये जाते थे। ख़ास कर राजस्थान, मध्यप्रदेश। मगर मंजराबाद का किला देख कर हमें यकीन हो जाएगा कि इस देश के हर कोने में नायाब इमारतें छिपी हुई हैं।