भारत मान्यताओं और आस्था का देश है। हर गली, मोहल्ले और शहर में आपको मंदिर, मस्जिद जैसे इबादत के कई तरह के स्थान नज़र आ जाएंगे। एक आम भारतीय जितना विश्वास कर्म में करता है उतनी ही उसकी श्रद्धा ईश्वर के प्रति भी बनी रहती है। हर कालखंड में हमारे पूर्वजों ने अपनी भक्ति को मूर्त रूप देने के लिए कई तरह की परंपराओं और आस्था स्थलों का निर्माण किया है। देश भर में आस्था के अनेकों ऐसे स्थल है जिनसे जुड़ी कई तरह की अनोखी कहानियां है। धर्म के अलावा यह अपने ऐतिहासिक और सामाजिक महत्त्व की वजह से भी खास बन जाते हैं। इसी तरह आस्था से भरा एक स्थान “समाधीस्वर महादेव मंदिर” राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित है।

1. समाधीस्वर मंदिर अपनी भव्यता और महिमा स्वयं बयां करता है:

  • इस मंदिर में तीन प्रवेश द्वार मौजूद हैं। इसके अंदर अर्ध मंडप, अलंकृत सभा मंडप, अंतराल और एक भव्य गर्भ गृह है। इस मंदिर के मुख्य द्वार के समक्ष भगवान नन्दी की प्रतिमा विराजमान है। मंदिर के गर्भ गृह में महादेव शिव शंकर की दिव्य और भव्य त्रिमुखी प्रतिमा स्थापित है।
  • मान्यता है कि यह त्रिमुख शिव के तीनों गुणों रज, तम और सत का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • मंदिर के नजदीक ही एक गौमुख कुंड बना हुआ है। यहां जलधारा गौमुख के नीचे विराजमान शिवलिंग पर अविरल भाव से बहती रहती है। मंदिर प्रांगण में प्रतीत होता है जैसे हम वर्तमान से निकल कर किसी और ही लोक में पहुंच गए हैं।

2. ‘समाधीस्वर महादेव मंदिर’ के अवतरण की गाथा:

समाधीस्वर मन्दिर के निर्माण को लेकर कई तरह की धारणाएं व्याप्त है।

  • सबसे ज्यादा सहमति इस तथ्य पर है कि इस भव्य मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में परमार शासक राजाभोज ने शिव के प्रति अपनी आस्था से प्रेरित होकर करवाया था।
  • इस मंदिर को त्रिभवननारायण का मंदिर, भोजजगती के नाम से भी जाना जाता है। महाराणा मोकल ने सन 1428 में इस मंदिर की मरम्मत करवाकर जीर्णोद्धार करवाया था। इस वजह से इसे मोकल जी का मंदिर भी कहते हैं।

3. मंदिर परिसर में मौजूद शिलालेख बताते हैं इतिहास की कथाएं:

इस मंदिर का धार्मिक दृष्टि से जितना महत्त्व है उतना ही यह इतिहास को पुष्ट करने में भी मदद करता है।

  • मंदिर प्रांगण में दो मुख्य शिलालेख मौजूद हैं। 1150 ईसवीं में गुजरात के सौलंकी शासक कुमारपाल ने अजमेर के तत्कालीन महाराजा अर्णोराज चौहान को परास्त किया था। अपनी जीत के बाद कुमारपाल ने शिव के इस दिव्य रूप वाले मंदिर में पूजा-अर्चना कर अपनी आस्था को प्रकट किया था।
  • साथ ही इस मंदिर के नाम पर एक गांव भी भेंट किया था। इस घटना के वर्णन के लिए उन्होंने मंदिर प्रांगण में एक शिलालेख स्थापित करवाया था।
  • वहीं दूसरा शिलालेख मंदिर का जीर्णोद्धार करवाने वाले महाराणा मोकल ने जीर्णोद्धार के समय बनवाया था।
  • यह दोनों ही शिलालेख ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं।

4. समिधेश्वर या समाधीस्वर:

  • इस मंदिर में शिव के रूप को समाधि स्वरूप देखा जाता है। जहां शिव समाधि में लीन नज़र आते हैं। अतः इसका नाम समाधीस्वर मंदिर पड़ा।
  • वहीं कुछ लोग इसे ‘समिधेश्वर’ भी कहते हैं तो कुछ इसका भी अपभ्रंश करके ‘समिधेसुर’ नाम से पुकारते हैं।
Chittorgarh-Samiddheshwara_Temple

5.समाधीस्वर मंदिर की वास्तुकला मोहित कर देगी आपको:

  • इस मंदिर की वास्तुशैली को देख कर आप इस मंदिर का पूरा चक्कर लगाए बिना अपने आपको रोक नहीं पाएंगे। यह परम्परागत हिन्दू शैली से बना मंदिर है।
  • मंदिर की बाहरी दीवारों पर सुंदर नक्काशी का काम किया गया है साथ ही इस पर हजारों मूर्तियों को अलंकृत किया गया है।
  • मंदिर को देखने पर लगेगा जैसे छोटी-छोटी मूर्तियों का कोई म्यूजियम हो।
  • जितनी बारीकी से काम को अंजाम दिया गया है वह वास्तुकला की तत्कालीन समय में समृद्धता को दर्शाता है। हालांकि समय की मार और रखरखाव के अभाव में कुछ मूर्तियां खंडित हो गई है फिर भी मंदिर की कलात्मकता आपको बांधे रखती है।

6. कुछ साक्ष्यों में इसे जैन मंदिर माना गया है:

कुछ इतिहासकारों का मत है कि यह मंदिर चालुक्य शासक कुमारपाल द्वारा बनाया गया एक विहार है। कुमारपाल के अभिलेख और वेदी बंध के नरथर और कुंभक की मूर्तियों के आधार पर इसे जैन मंदिर माना है।यशपाल के मोहपराजय नाटक के आधार पर कुमारपाल ने जैन धर्म स्वीकार कर लिया था। इस दृष्टि से भी इस मंदिर के जैन मंदिर होने की धारणाओं को पुष्टि दी गई।
वहीं कुछ जानकारों का मानना है कि तत्कालीन समय में जैन और हिंदू दोनों ही धर्मों की प्रासाद वस्तु और तक्षक एक ही तरह के हुआ करते थे। मंदिर के गर्भ गृह में मौजूद शिव की महेश मूर्ति जो भैरव को प्रतिबिंबित करती है इसे एक हिंदू मंदिर साबित करती है।

7. कब जाएं:

  • इस इलाके में साल के अधिकांश समय 25 से 35 डिग्री के लगभग तापमान बना रहता है। गर्मियों के मौसम में तो पारा 45 डिग्री के पार पहुंच जाता है।
  • ऐसे में यहां जाने का सबसे उचित समय नवम्बर से मार्च के बीच होता है। इस वक़्त आप बिना गर्मी की ख़लल के घूमने का आनंद उठा सकते हैं।

8. कैसे जाएं:

  • चितौड़गढ़ जाने के लिए यदि आप हवाई मार्ग लेते हैं तो यहां सबसे नजदीकी एयरपोर्ट उदयपुर एयरपोर्ट है। इसे डबोक हवाईअड्डा भी कहते हैं। यह चितौड़गढ़ से मात्र 70 किलोमीटर की दूरी पर है।
  • रेल मार्ग से चितौड़गढ़ दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, जयपुर, उदयपुर और अन्य कई प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है।
  • सड़क मार्ग की कनेक्टिविटी भी यहां काफी अच्छी है।

मेवाड़ को वीरता के लिए जाना जाता है। वीर राजाओं ने अनेक युद्धों के साथ अनेक किलों और उन किलों में अपनी आस्था के प्रतीक के रूप में अनेक अदभुत मंदिरों का निर्माण करवाया था। इन मंदिरों के अंदर तत्कालीन समय की वास्तुकला, उन दिनों किस तरह समाज का ढांचा अस्तित्व में था उसकी छाप और एक अलग ही आध्यात्मिक सुकून का एहसास होता है। एक तरह से हम इंसान के विकास की कहानी से होकर गुज़रते हैं। अगर आप इतिहास, आध्यात्म, वास्तुकला तीनों का संगम देखना चाहते हैं तो चितौड़ के दुर्ग में बना समाधीस्वर महादेव आपके लिए परफेक्ट डेस्टिनेशन है।